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Saeed Ahmad, Date of Birth : August 09, 1963 Birth Place : Kanpur Marital Status : Married Cadre : NCC Profession : Journalism (Media consultant, Web & Print)

Thursday, 11 June 2015

क्यों कि मै हिजड़ा हूं


ऐ माँ ; ओ बापू, दीदी और भईया, आपका ही बेटी या बेटा था, पशु नही जन्मा था परिवार में, आपके ही दिल का, चुभता सा टुकड़ा हूँ , क्यों कि मै हिजड़ा हूं। कोख की धरती पर आपने रोपा था, नौ माह जीवन सत्व चूसा तुमसे मॉ, फलता भी पर कटी गर्भनाल जड़ से उखाड़ा हूं, क्यों कि मै हिजड़ा हूं। लज्जा का विषय क्यों हूं मॉ मेरी, अंधा,बहरा या मनोरोगी तो नही था मै, मै ही बस ममतामयी गोद से बिछड़ा हूं, क्यों कि मै हिजड़ा हूं। अर्ध नारीश्वर भी भगवान का रुप मान्य है, हाथी,बंदर,बेल सब देव तुल्य पूज्य है, मै तो मानव होकर भी सबसे पिछड़ा हूं, क्यों कि मै हिजड़ा हूं।

'अगले जनम मोहे हिजड़ा न कीजो'


'अगले जनम मोहे हिजड़ा न कीजो' बेटा घर का राज है तो बेटी घर की लाज. लेकिन दोनों का मिश्रित रूप किन्नर अर्थात हिजड़ा पैदा हो तो क्यों गिर जाती है सब पर गाज. इस नौनिहाल बच्चे को उसको जन्म देने वाले ही या तो फेंक देते है या फिर एसों के हाथों सौंप देते है जिनपर न तो इनको विश्वास होता है और न ही इस वर्ग की ये लोग इज्जत करते है. हद तक की उन्हें पसंद नहीं करते. सिर्फ लोकलाज का वास्ता समझकर अपने लखते जिगर को अनजान हाथों में दे देते है. अपने अरमानों, अपनी प्राथनाओं में पुत्र-पुत्री की कल्पना पाले यह समाज जितना उत्साह और उल्हास से भरा होता है वही उदास और खौफजदा क्यों हो जाता है. जिसे अपनों से प्यार दुलार मिलना चाहिए वह जन्म से ही तिरस्कार उसका भाग्य बन जाता है. जन्म से लेकर जीवनभर प्रताड़ना झेलने वाला हिजड़ा आखिर यही दुआ करेगा कि अगले जनम मोहे हिजड़ा ना कीजो. इसके लिए यह कई परम्पराओं को अपनाते भी है. जिनमे मरने के बाद मृतक को जूते अथवा झाडू छुलाने की परम्परा भी है. कुछ लोग इस्लाम धर्म भी अपना लेते है क्योंकि इस्लाम में पुनर्जन्म की मान्यता नहीं है. जबकि किन्नर के अर्धनारीश्वर यानी शिव उनके आराध्य देव हैं। लेकिन वे बहुचरा माता और अरावान (महाभारत के अर्जुन के पुत्र) की विशेष पूजा करते हैं। इनकी संख्या के बारे में सरकार के पास कोई आंकड़ा नहीं है। मोटा अनुमान है कि पूरे देश में इनकी तादाद 10-15 लाख होगी। बताते हैं कि पूरा हिजड़ा समुदाय सात घरानों में बंटा हुआ है। हर घराने का मुखिया एक नायक होता है जो चेलों की शिक्षा-दीक्षा के लिए गुरुओं की नियुक्ति करता है। ताली बजाना और लचक-मटक कर चलना हिजड़ों का स्वाभाविक गुण नहीं है। यह एक सीखी हुई ‘कला’ है। यह भी गौरतलब है कि कोई जान-बूझकर हिजड़ा नहीं बनता। वो जन्म से ही लैंगिक रूप से विकलांग होते हैं। देश के 90 फीसदी हिजड़े ऐसे ही हैं। केवल 10 फीसदी हिजड़े ऐसे हैं जो जन्म से होते तो पुरुष हैं, लेकिन दर्दनाक ऑपरेशन से उनके जननांग हटाये जाते हैं। इसके पीछे वैसे ही अपराधियों का हाथ होता है, जैसे अपराधी हाथ-पैर काटकर बच्चों से भीख मंगवाते हैं। पुराने भारतीय ग्रंथों में भी इन्हें तृतीय प्रकृति कहा गया है। सारी दुनिया में इनकी मौजूदगी है। लेकिन इनकी दुर्गति कमोवेश हर जगह ही है। ये एक तरह के विकलांग हैं। लेकिन विकलांगों जैसी कोई सहूलियत इन्हें नहीं मिलती। परिवार में जन्मते ही इन्हें फेंक दिया जाता है। फिर इन्हें अपने गुजारे के लिए अंधेरे और अंधविश्वासों से भरी ऐसी दुनिया में शरण लेनी पड़ती है जो शायद किसी शापित नरक से भी बदतर है। कहने को किन्नर या हिजड़े अब राजनीति में भी आ चुके हैं, लेकिन उनसे जुड़े मानवाधिकारों की चर्चा यदाकदा ही होती है। हिजड़ों को वोट देने का अधिकार भारत में 1994 में ही मिला। उसके बाद से 1999 में शहडोल से चुनकर आई शबनम मौसी देश की पहली किन्नर विधायक बनी। फिर तो कमला जान (कटनी की मेयर), मीनाबाई (सेहोरा नगरपालिका की अध्यक्ष), सोनिया अजमेरी (राजस्थान में विधायक), कमला बुआ मध्य प्रदेश के सागर की मेयर और आशा देवी (गोरखपुर की मेयर) सार्वजनिक हस्ती बन गईं। देहरादून के मेयर चुनावों में रजनी रावत नाम की किन्नर भी प्रत्याशी थी। इसके अतिरिक्त अभिनेत्री एवं माडल पद्मिनी प्रकाश ने एक समाचार चैनल पर समाचार वाचक की तरह शुरूआत की। अमृता अल्पेश सोनी को छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य में एचआईवी व एड्स पीड़ितों की देख रेख के लिए नोडल अधिकारी बनाया है। फैशन डिजायनर सिल्वी आधुनिक ब्यूटी पार्लर की श्रंखला चलाती है. लग्जरी जीवन जीती है. भारत सरकार के एक विभाग में किन्नर मणि थापा अपनी सेवाएँ दे रही है. सरकार की भेदभाव भरी नीतियों की वजह से काफी लोग अपनी पहचान छुपाकर नौकरी कर रहे है. जिनका खुलासा किसी घटना अथवा सेवानिर्वत्ति के बाद होता है. लेकिन राजनीति सहित अन्य क्षेत्रों में धमक के बावूजद समाज में हिजड़ों के खिलाफ भ्रम और हिंसा का बोलबाला है। और इस रवैये का स्रोत है अंग्रेज़ों के राज में बना 1871 का क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, जिसमें 1897 में एक संशोधन के बाद स्थानीय शासन को आदेश दिया गया है कि वे सभी हिजड़ों के नाम और आवास का पूरा रजिस्टर रखें जो ‘बच्चों का अपहरण करके उनको अपने जैसा’ बनाते हैं, आईपीसी के सेक्शन 377 में आनेवाले अपराध करते हैं। ये गैर-जमानती अपराध है और इसमें छह महीने से लेकर सात साल तक की कैद हो सकती है। पुलिस आज भी आईपीसी के सेक्शन 377 के तहत जब चाहे, तब किन्नरों को अपने इशारों पर नचाती है। इस सेक्शन को खत्म करने की याचिका अभी तक कोर्ट में लंबित पड़ी है।

सिर्फ क़ानून नहीं सम्मान भी चाहिए

किन्नर समुदाय के हित में काम करने वाली समाजसेवी संगठन “इक-एहसास” ने सरकारों से मांग की है कि किन्नरों पर दिए गए आदेश को पूरी तरह अमलीजामा पहनाएं। सर्वोच्च न्यायालय ने किन्नरों के अधिकारों की रक्षा करने और उनकी मदद करने व उनसे भेदभाव और उनका दमन खत्म करने का आदेश दिया था। अप्रैल 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि लोगों को किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान लेना चाहिए और केवल सभी बुनियादी अधिकार तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि शिक्षा एवं रोजगार में विशेष लाभ भी मिलना चाहिए। संस्था ने कहा है, "भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष अंतत: किन्नरों को मतदान का, शिक्षा प्राप्त करने या रोजगार पाने के अधिकार को स्वीकार किया।" अब यह अधिकारियों पर है कि वे उन लोगों के खिलाफ मामला चलाकर सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था लागू करें जिन्होंने किन्नरों को सम्मान के साथ और बगैर तकलीफ के जीने का अधिकार नहीं दे कर उन्हें निशाना बनाया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के एक वर्ष बाद भी उसे अमलीजामा पहनाने का काम रुका हुआ है। संगठन ने कहा कि भारतीय दंड विधान की धारा 377 के अनुसार परिपक्व वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंध आपराधिक है और इससे किन्नर और होमोसैक्सुअल पुलिस प्रताड़ना, दोहन और उत्पीड़न की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील हैं।

आप प्रकृति के फूल, और किन्नर प्रकृति की भूल

जरा सोचिए आप को जीवनपर्यन्त किसी भयंकर मानसिक, सामाजिक और शारीरिक प्रताडना से गुजरना पडे और कारण के लिए आप नही प्रकृति उत्तरदायी है । तब आपके मन में इस दुनिया और दुनिया बनाने वाले ईश्वर, इस समाज और जन्म देने वाले माँ-बाप के प्रति क्या विश्वास पनपेगा। फिर भी यह समुदाय सभी से सब प्रकार की पीणा मिलने के बाद आशीष के लिए, दुआओं के लिए अपने हाथ उठाते है। क्षण भर के लिए ज़रा सोचिएं की जात-धर्म, ऊंच-नीच में घिरे समाज के बीच यह समुदाय किसी किन्नर को किसी भेदभाव के अपना लेते है। इतना ही नही ये किन्नर हर किसी की खुशी मे गाने-बजाने पहूँच जाते है, न उसकी जात देखते, न धर्म, न ऊँच-नीच और बदले मे इन्हे समाज क्या देता है घृणा और अपमान। इनके नाजो-नखरे देख अक्सर लोग हंस पड़ते हैं । अगर आप इनकी जिंदगी की असलियत जान ले तो शायद न किसी को हंसी आए और न ही उनसे घबराहट हो। आम इंसानों की तरह इनके पास भी दिल होता है, दिमाग होता है, इन्हें भी भूख सताती है, आशियाने की जरूरत इन्हें भी होती है । फिर भी उन्हें आम इंसानों की तरह नहीं समझा जाता, उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता, उन्हें सरकार कोई आरक्षण नही देती, व्यवसायी वर्ग उन्हें नौकरी नहीं देता और तो और गाने बजाने और नाचने के अलावा कोई उनसे दोस्ती नहीं करता, उनसे बात नहीं करता क्योंकि वो समाज में हेय दृष्टि से देखे जाते है मानो वो कोई परग्रही हों। क्यों उन्हें इस तरह सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता है ? क्यों समाज उनके प्रति लचीला रुख नहीं अपनाता ? सवाल बहुत से है लेकिन उत्तर नहीं। आखिर किन्नर पैदा कैसे होते है ? “इक-एहसास” संस्था के एक शोध एवं आधुनिक विज्ञान के अनुसार हॉर्मोनस् और गुणसूत्रो की अनियमिता के कारण किन्नर जन्म लेते है । हर मनुष्य में नर और नारी दोनों के लिए आवश्यक हॉर्मोनस् होते है, उनका कम या ज्यादा का अनुपात ही कुछ को पूर्ण नर और कुछ को पूर्ण नारी बनता है l जहाँ ये अनुपात गड़बड़ा जाता है वही किन्नर जन्म लेता है । परन्तु यदि आध्यात्म की दृष्टि से देखा जाये तो, चंद्रमा, मंगल, सूर्य और लग्न से गर्भाधान का विचार किया जाता है। इसमें माना जाता है कि ग्रहों की कुद्रष्टि के कारण किन्नर जन्म लेता है। इसके अनुसार ।।। 1। शनि व शुक्र अष्टम या दशम भाव में शुभ दृष्टि से रहित हों तो किन्नर (नपुंसक) का जन्म होता है। 2। छठे, बारहवें भाव में जलराशिगत शनि को शुभ ग्रह न देखते हों तो किन्नर (नपुंसक) होता है। 3। चंद्रमा व सूर्य शनि, बुध मंगल कोई एका ग्रह युग्म विषम व सम राशि में बैठकर एका दूसरे को देखते हैं तो किन्नर (नपुंसक) जन्म होता है। 4। विषम राशि के लग्न को समराशिगत मंगल देखता हो तो वह न पुरुष होता है और न ही कन्या का जन्म। 5। शुक्र, चंद्रमा व लग्न ये तीनों पुरुष राशि नवांश में हों तो किन्नर (नपुंसक) जन्म लेता है। 6। शनि व शुक्र दशम स्थान में होने पर किन्नर (नपुंसक) होता है। 7। शुक्र से षष्ठ या अष्टम स्थान में शनि होने पर किन्नर (नपुंसक) जन्म लेता है। 8। कारज़ंश कुडली में ज़ेतु पर शनि व बुध की दृष्टि होने पर किन्नर (नपुंसक) होता है। 9। शनि व शुक्र पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो अथवा वे ग्रह अष्टम स्थान में हों तथा शुभ दृष्टि से रहित हों तो किन्नर (नपुंसक) जन्म लेता है। जबकि आयुर्वेद के मुताबिक़ वीर्य की अधिकता से पुरुष (पुत्र) होता है। आर्तव की अधिकता से स्त्री (कन्या) होती है। शुक्र शोणित (रक्त और रज) का साम्य (बराबर) होने से नपुंसका का जन्म होता है।

किन्नर

किन्नर किन्नर हिमालय के क्षेत्रों में बसने वाली एक मनुष्य जाति का नाम है। इस जाति के प्रधान केंद्र 'हिमवत' और 'हेमकूट' थे। किन्नर हिमालय में आधुनिक कन्नोर प्रदेश के पहाड़ी कहे जाते हैं, जिनकी भाषा कन्नौरी, गलचा, लाहौली आदि बोलियों के परिवार की है। 'पुराण' तथा 'महाभारत' आदि की कथाओं में किन्नरों का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है। उल्लेख पुराणों और महाभारत की कथाओं एवं आख्यानों में तो किन्नरों की चर्चाएँ प्राप्त होती ही हैं, 'कादंबरी' जैसे कुछ साहित्यिक ग्रंथों में भी उनके स्वरूप, निवास क्षेत्र और क्रियाकलापों के वर्णन मिलते हैं। जैसा कि उनके नाम ‘किं+नर’ से स्पष्ट है, उनकी योनि और आकृति पूर्णत: मनुष्य की नहीं मानी जाती। संभव है किन्नरों से तात्पर्य उक्त प्रदेश में रहने वाले मंगोल रक्त प्रधान, उन पीत वर्ण लोगों से हो, जिनमें स्त्री-पुरुष-भेद भौगोलिक और रक्तगत विशेषताओं के कारण आसानी से न किया जा सकता हो। उत्पति विचार किन्नरों की उत्पति के विषय में निम्नलिखित दो प्रवाद हैं- ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा की छाया अथवा उनके पैर के अँगूठे से किन्नर उत्पन्न हुए। 'अरिष्टा' और 'कश्पय' किन्नरों के आदिजनक थे। महत्त्वपूर्ण तथ्य हिमालय का पवित्र शिखर 'कैलाश' किन्नरों का प्रधान निवास स्थान था, जहाँ वे भगवान शंकर की सेवा किया करते थे। उन्हें देवताओं का गायक और भक्त समझा जाता है, और यह विश्वास है कि यक्षों और गंधर्वों की तरह वे नृत्य और गान में प्रवीण होते थे। विराट पुरुष इंद्र और हरि उनके पूज्य थे। पुराणों का कथन है कि कृष्ण का दर्शन करने वे द्वारका तक गए थे। सप्तर्षियों से उनके धर्म जानने की कथाएँ प्राप्त होती हैं। उनके सैकड़ों गण थे और चित्ररथ उनका प्रधान अधिपति था। 'शतपथ ब्राह्मण' में अश्वमुखी मानव शरीर वाले किन्नर का उल्लेख है। बौद्ध साहित्य में किन्नर की कल्पना मानवमुखी पक्षी के रूप में की गई है। मानसार में किन्नर के गरुड़ मुखी, मानव शरीरी और पशुपदी रूप का वर्णन है। इस अभिप्राय का चित्रण भरहुत के अनेक उच्चित्रणों में हुआ है।
किन्नरों को पहचान के साथ मिला कानूनी दर्जा शुभ अवसरों पर बधाई के मंगल गान गाने वाले मंगलामुखी किन्नरों को सुप्रीमकोर्ट ने पहचान के साथ कानूनी दर्जा देने का आदेश दिया है। सुप्रीमकोर्ट ने न सिर्फ किन्नरों को लिंग की तीसरी श्रेणी में शामिल करने का आदेश दिया है, बल्कि उन्हें शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों में आरक्षण देने का भी आदेश दिया है। कोर्ट ने किन्नरों को बराबरी का हक देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे किन्नरों की सामाजिक और लिंगानुगत समस्याओं का निवारण करें। इतना ही नहीं उन्हें चिकित्सा सुविधा व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएं। न्यायमूर्ति केएस। राधाकृष्णन व न्यायमूर्ति ऐके सीकरी की पीठ ने किन्नरों को पहचान के साथ कानूनी दर्जा मांगने वाली नेशनल लीगल सर्विस अथारिटी (नालसा), किन्नरों के कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था पूज्य माता नसीब कौर जी वूमेन वेलफेयर सोसाइटी तथा किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की याचिकाएं स्वीकार करते हुए सुनाया है। कोर्ट ने किन्नरों को बराबरी का कानूनी हक देते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को नौ दिशा निर्देश जारी किए हैं। पीठ ने कहा कि संविधान में सभी को बराबरी का दर्जा दिया गया है और लिंग के आधार पर भेदभाव की मनाही की गई है। लिंग के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव बराबरी के मौलिक अधिकार का हनन है। संविधान में बराबरी का हक देने वाले अनुच्छेद 14, 15, 16 और 21 का लिंग से कोई संबंध नहीं हैं। इसलिए ये सिर्फ स्त्री, पुरुष तक सीमित नहीं है। इनमें किन्नर भी शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि किसी का लिंग उसकी आंतरिक भावना से तय होता है कि वह पुरुष महसूस करता है या स्त्री या फिर तीसरे लिंग में आता है। किन्नर को न तो स्त्री माना जा सकता है और न ही पुरुष। वे तीसरे लिंग में आते हैं। किन्नर एक विशेष सामाजिक धार्मिक और सांस्कृतिक समूह है इसलिए इन्हें स्त्री, पुरुष से अलग तीसरा लिंग माना जाना चाहिए। कोर्ट ने देश विदेश में किन्नरों के कानूनी दर्जे पर भी चर्चा की है। कोर्ट ने कहा है कि पंजाब में सभी किन्नरों को पुरुष माना जाता है जो कि कानूनन ठीक नहीं है। केरल, त्रिपुरा और बिहार में किन्नरों को तीसरे लिंग में शामिल किया गया है। कुछ राज्यों में उन्हे तीसरी श्रेणी माना है। तमिलनाडु ने किन्नरों के कल्याण के लिए काफी कुछ किया है। कोर्ट ने कहा कि हमारे पड़ोसी राज्य नेपाल और पाकिस्तान ने भी उन्हें पहचान और कानूनी हक दिए हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में स्व पहचान का अधिकार शामिल है। कोर्ट ने किन्नरों को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा बताते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि शैक्षणिक संस्थानों व नौकरियों में पिछड़ों को दिया जाने वाला आरक्षण किन्नरों को भी दें। कोर्ट ने कहा है कि किन्नरों की दशा पर विचार कर रही सरकार की कमेटी तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दे। सरकार उस रिपोर्ट पर विचार कर इस फैसले को ध्यान में रखते हुए छह महीने के भीतर लागू करे। कोर्ट ने सरकार को दिया आदेश 1- किन्नरों को तीसरे लिंग के तौर पर शामिल कर संविधान और कानून में मिले सभी अधिकार और संरक्षण दिये जाएं 2- किन्नरों को अपने लिंग की पहचान तय करने का हक है। केंद्र व सभी राज्य सरकारें उन्हें कानूनी पहचान दें। 3- किन्नरों को सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ा मानते हुए शिक्षण संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों में आरक्षण दिया जाए 4- सरकार किन्नरों की चिकित्सा समस्याओं के लिए अलग से एचआइवी सीरो सर्विलांस केंद्र स्थापित करें। 5- सरकार किन्नरों की सामाजिक समस्याओं जैसे भय, अपमान, शर्म व सामाजिक कलंक आदि के निवारण के गंभीर प्रयास करे 6- किन्नरों को अस्पतालों में चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराए और अलग से पब्लिक टायलेट व अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराए 7- सरकारें किन्नरों की बेहतरी के लिए सामाजिक कल्याण योजनाएं बनाएं 8- सरकार किन्नरों को समाज की मुख्य धारा में शामिल करने के प्रयास करें ताकि किन्नर अपने को अछूत या अलग थलग न महसूस करें 9- सरकार किन्नरों को उनकी पुरानी सांस्कृतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा की पहचान दिलाने के लिए कदम उठाएं

दुनिया में हिजड़ो के हालात

विश्व में किन्नरों की स्थिति विश्व में किन्नर समुदाय एक ‘ट्रांसजेंडर’ के रूप में जाने जाते हैं, जिनका इतिहास अधिक प्राचीन नहीं है। इन्हें एलजीबीटी समुदाय का एक वर्ग भी माना जाता है। विश्व में इनकी प्राचीनतम उपस्थिति दक्षिण अफ्रीका और वर्तमान में अधिकतर अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप आदि देशों में मिलती है। इस वर्ग की प्रास्थिति और अधिकारों के लिए वर्ष 2006 में इंडोनेशिया के योज्ञकर्ता में एक विश्व सम्मेलन (6 से 9 नवंबर) आयोजित किया गया जिसमें इनकी लैंगिक उत्पत्ति एवं लिंगीय पहचान को मान्यता प्रदान करते हुए कुछ सिद्धांतों को अंगीकृत किया गया जिन्हें ‘योज्ञकर्ता सिद्धांत’ कहते हैं। योज्ञकर्ता सिद्धांत के बाद विश्व के अनेक देशों ने इस वर्ग के लिए कानून बनाए हैं, जिनमें ब्रिटेन का समानता अधिनियम, 2010, ऑस्ट्रेलिया का लिंग विभेद अधिनियम, 1984 एवं संशोधन अधिनियम, 2013, यूरोपियन यूनियन कानून, 2006 (5 जुलाई, 2006 से 27 देशों में लागू), हेट क्राइम प्रिवेंशन एक्ट, 2009 (अमेरिका) इत्यादि मुख्य हैं। नेपाल के उच्चतम न्यायालय ने सुनील बाबू पंत (2007) के मामले में इस समुदाय को ‘तृतीय लिंग’ की पहचान प्रदान की है।